Sunday, 2 October 2011

Bhag Bhag Bharastachari

भाग भाग भ्रष्टाचारी
भाग भाग भ्रष्टाचारी
आ गया है नया गाँधी
बापू के कदमों पर चलने वाला
वो है अहिंसा का पुजारी ।

ना गोली, ना बंदुक
ना ढ़ाल, ना तलवार
फिर भी कहता है
दुर भगायेगा भ्रष्टाचार ।

भ्रष्टाचारियों अब तुम्हारी खैर क्या
जब टिक नहीं सका पूरा इंग्लिस्तान
उस हथियार के सामने
तो तुम सब की औकात क्या ।

बापू का है वो नया अवतार
भगाने आया भ्रष्टाचार
खत्म करने सारे अत्याचार
आ गया है गरीबों का हमराज़ ।

हम सब का है वो अन्ना
दुभर कर देगा तुमको जीना
जान बचाना हो तो भाग जाना
नहीं तो जीवन भर पछताना ।

ये भ्रष्टाचार के ख़िलाफ लड़ाई है
ना करेंगें भ्रष्टाचार
ना होने देंगें भ्रष्टाचार
ये कसम हमने खाई है ।

ये जन-संतन की है आवाज़
लोकपाल बनेगा आधार
सब का होगा लेखा-जोखा
फिर ना छुपेगा कोई राज़ ।

भाग भाग भ्रष्टाचारी
आ गया है नया गाँधी ।  

अंगूर खट्टे हैं


ड्रीम गर्ल, ड्रीम गर्ल, कभी तो मिलेगी, कोई तो मिलेगी आज नहीं तो कल..........

रोजाना की तरह आज भी छः बजते ही मेरे मोबाईल ने मेरे इस प्रिय गीत को बजाकर मेरे ड्रीम गर्ल के सपने की बैंड बजाते हुए मुझे उठने पर मजबूर कर दिया और मैं भी अलार्म को बंद कर फिर से ड्रीम गर्ल के सपने में जाने की नाकाम कोशिश करने लगा। थोड़ी देर के बाद माँ चाय के साथ मेरे कमरे में आकर मुझे उठाते हुए बोली, उठ जा, कब तक सोयेगा? आज भी आठ बजे उठने का इरादा है क्या?” इतना सुनते ही मैं उठ बैठा। चाय की चुसकियाँ लेते हुए मैं, कॉलेज में मेरा दिन कैसा होगा, इस सोच में प गया।

तैयार होने के बाद मेरे चेहरे पर असमंजस की स्थिती थी। वो इसलिए कि मैंने सुन रखा था कि कॉलेज मे सीनियरस् रैगिंग करते हैं, बहुत परेशान करते हैं, ऐसा सोचकर भय लग रहा था। दूसरी तरफ खुशी थी कि कॉलेज मे ढेर सारी खूबसुरत लकियाँ मिलेगी, शायद उनमें कोई मेरी ड्रीम गर्ल हो और मेरा सपना, अभियांत्रिकी पढने का, भी सच होने वाला था। इसलिए मन में उल्लास भरा उमंग भी था।

कॉलेज जाने के लिए मैं बस में बैठा। बस में भी मैं यह सब ही सोच रहा था कि कॉलेज कब पीछे छूट गया पता ही नहीं चला और मैं कॉलेज वाले बस स्टॉप पर ना उतर कर उसके अगले वाले बस स्टॉप पे उतरा। नतीजतन मै पहले ही दिन कॉलेज लेट पहुँचा। सीनीयरस् तो नहीं मिले, पर खूबसुरत लकियाँ जरुर मिली, वो भी मेरी ही कक्षा में। पूरा दिन तो परिचय लेते देते बीत गया। हर एक अध्यापक, जो भी आये, सबने परिचय देने को कहा और अपनी धौक जमायी। शाम को जब कॉलेज से घर लौटने लगा तो सीनीयरस् मिल गये। सोचा था कि शाम को लौटते वक्त लकियों से बातें करुंगा, लेकिन सीनीयरस् मिल गये। मन ही मन उनको कोस रहा था, थोड़ा डर भी लग रहा था। उन लोगों ने देखते ही इशारे से बुलाया। फिर शुरु हो गया उनका रैगिंग कार्यक्रम। उनमें से एक ने लकियो के एक ग्रुप की तरफ इशारा करते हुए बोला कि जाकर उन सबका नाम पूछकर आ। मैने जब लकियों के ग्रुप की तरफ देखा तो पता चला कि वो सारी लकियाँ मेरी ही कक्षा की थी। बस क्या था, मैं दौड़ा-दौड़ा उनके पास गया, और जाकर बोला-मेरी मदद कीजिए, कुछ सीनियरस् ने आपलोगो के नाम पूछने के लिए मुझे भेजा है। इतना सुनते ही उनमें से एक लकी ने मुझसे पूछा कि तुम तो हमारे ही वर्ग में हो और तुम ही देर से आये थे ना। मैं मन ही मन खुश हुआ कि चलो, किसी को तो मैं याद हूँ और जब मैंने देखा कि ऐसा बोलने वाली कोई और नहीं बल्कि वही थी जिसे मैं पूरे दिन वर्ग मे देख रहा था तो मैं मन ही मन बहुत खुश हुआ। फिर सबका नाम पूछा और सीनीयरस् को बता दिया, तब जाकर मुझे घर जाने की इजाजत मिली। लेकिन घर पहुँचने के बाद मैं ना चाहते हुए भी उस लकी के ही बारे मे सोच रहा था। वो दो मिनट की उस लकी से बात मेरी ड्रीम गर्ल के सपने के सच होने का एहसास कराने लगा। मैं रात भर उसके बारे में सोचता रहा और सच कहूँ तो मैं सो भी नहीं पाया उस रात। अगले दिन मैं उस लकी से बात करने की लिए आधा घंटा पहले ही कॉलेज पहुँचा, तो देखा कि वह लकी उस सीनीयर से बात कर रही थी। मैं सीनीयर के डर से उसके पास नहीं गया। जब वह क्लास मे आई तो मैंने उसके पास जाकर पूछा- क्या वह तुम्हारी भी रैंगिग कर रहा था?” इसपे वो हसने लगी और बोली- अरे नहीं वो तो मेरा बॉयफ्रैंड है।इतना सुनते ही मैं अवाक् सा रह गया। जोर का धक्का धीरे से लगने वाला मेरा हाल था। मेरा प्यार जो कल शुरु हुआ था आज खत्म भी हो गया था। मैने एक ही दिन में कितने सपने देख लिए थे, सारे सपने एक पल में मोतियों की तरह बिखर गये। मेरे सपने का ऐसा अंजाम होगा, मैंने सोचा भी नहीं था। खैर, मैं अब कर भी क्या सकता था, पढने पे ध्यान देने लगा। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरा पढाई में मन एकदम नहीं लग रहा था। जब भी पढने बैठता, ना चाहते हुए भी उसी का ख्याल आ जाता था।
मैने यह बात माँ को बताई। तब माँ ने कहा- ऐसा होता है, हम जिसकी तमन्ना करते हैं, वो हमेशा नहीं मिलती। फिर माँ ने मुझे लोमड़ी और अंगूर की कहानी सुनाई। जिसमें भूखी लोमड़ी कई असफल प्रयत्न के बाद भी अंगूर खा नहीं पाती और अंत में अंगूर को खट्टा मान कर किसी दूसरी खाद्य वस्तु की तलाश में निकल जाती है। फिर माँ ने कहा- वो अंगूर खट्टे नहीं थे। लोमड़ी जब उस अंगूर को ना पा सकी तब उसने खुद को समझाने के लिए ऐसा मान लिया, और कुछ और खाद्य वस्तु की तलाश में निकल गई। इसलिए अगली बार जब उस लकी को देखना तो मन ही मन कहना कि अंगूर खट्टे हैं और पढाई पर ध्यान देना। माँ की ये तरकीब काम कर गई। इसलिए अब मैं जब भी किसी काम में सर्वोतम कोशिश करने के बाद भी असफल होता हूँ तो मान लेता हूँ कि ये अंगूर खट्टे हैं।